रविवार, 24 दिसंबर 2017

दिसंबर के ख़्वाब...

(१)

हमें एक सीढ़ी बनानी थी
छत पर धूप में पड़े ख़्वाबों तक पहुँचने और उन्हें सूर्यास्त से पहले ही उतार लेने के लिए,
अम्मा बाबू जी को खत में लिखा करती थीं ये बात.. कि
दिसम्बर के दिनों अगर ख़्वाबों की देखभाल ठीक हो जाये तो बसंत आने पर खिलते हैं उनमें
मनभावन फूल,
मैं अकेले बाँस तो हो सकता था किंतु सीढ़ी नहीं
हमारे भावों की एक सीढ़ी
घर की छत तक तभी पहुँच पायी
जब तुम्हारा समर्पण लग गया उसमें डंडों की तरह,
किसी का ऊपर चढ़ना या नीचे उतरना
हो सकता है एकांतिक यात्रा
किंतु
सीढियाँ हमेशा प्रतीक हैं साथ की सहचर की !

मेरी सहचरी !
तुम्हें बसंत ऋतु की हार्दिक शुभकामनाएँ !

(२)

दिसंबर के किसी ख़्वाब में घुसती हुई
नवंबर की याद और जनवरी की कल्पना को... अब
डपट देता हूँ मैं
पूस माघ वाले समय में ऐसा नहीं कर पाता मैं
तब उतरते अगहन में फागुन की कल्पना और तैयारी
दोनों सहज स्वीकार्य थीं
अंग्रेजों के आदर्श जीवन ने तो हमारे फागुन से भी फगुनहट छीन ली,
इस दिसंबर मैंने भी कोई ग्लोबल सपना नहीं देखा
न धरती को सुंदर बनाने का
न ही सुख और समृद्धि का
बस खोया रहा तुम्हारी कजरारी आँखों की शर्मीली मुस्कान में
सुना है इस बार फागुन और बसंत ने हाथ मिला लिया है
मार्च की बजट समीक्षाओं के खिलाफ़,

सुनो
इस बार फागुन का हर रंग जी लेना
और जी लेना इस साल की बसंत बहार !

© आनंद

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

सुहानी राह है हम हैं

सुहानी राह है, हम हैं, सफर है
यहाँ से ज़िंदगी हद्दे नज़र है

मुहब्बत नाम की एक शै मिली है
मगर वो इस जहाँ से बेख़बर है

महकते गेसुओं ने ख़त लिखा है
मुसाफिर, अब ये दूरी मुख़्तसर है

ये मस्ती चाल की ये लड़खड़ाहट
ये मयख़ाना नहीं उसकी नज़र है

हमारे ग़म, हमीं को बेंच देगा
यही बाज़ार का असली हुनर है

कबीरों की न अब कोई सुनेगा
सियासत का बड़ा गहरा असर है

कहीं आनंद मिलता हो तो ले लें
ये बस्ती तो प्रदूषण है ज़हर है ।

© आनंद

सोमवार, 6 नवंबर 2017

ये समझिये

हजारों रंग की मेरी कहानी, ये समझिये
पलों में ख़ार पल में गुल्फ़िशानी ये समझिये

शरारत ये बड़ी मासूम की है ख़ुशबुओं ने
रग़ों में बह चली है रातरानी ये समझिये

पड़ेगा वक़्त तो ये रतजगे सच बोल देंगे
हुए हैं ख़्वाब कैसे जाफ़रानी ये समझिये

बहारें भी यहाँ महफूज़ रहना जानती हैं
हुए हैं रंग सारे हुक्मरानी ये समझिये

जहाँ बच्चे लगाकर मास्क साँसे ले रहे हैं
हमारे देश की है राजधानी ये समझिये

अभी मैं डर रहा हूँ हर कदम राहों में तेरी
अभी सब याद हैं बातें पुरानी ये समझिये

कभी दो चार दिन आनंद के भी संग रहिये
कठिन संग्राम सी है जिंदगानी ये समझिये

© आनंद

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

इश्क़ की राह

मेरी ज़िद
तुम्हारे झुमके में फँसा
चुनरी का वो हिस्सा है
जिसे तुम बड़े एहतियात से छुड़ाती हो,
उस घड़ी
खीझ और धैर्य का 'प्रयाग' होता है
तुम्हारा चेहरा

तुम्हारा उलाहना
मेरी कलम का खो गया वो कैप है
जिसके बिना
खतरे में है उसका अस्तित्व
कितना भी अच्छा लिखने के बावजूद,
उस घड़ी
इश्क़ की इबारत होता है
तुम्हारा उलाहना

मेरी जिद और तुम्हारे उलाहने
दोनों से
दो कोस और रह जाता है इश्क़
जब कभी खुले बाल लेकर तुम तय करती हो
ये दो कोस की दूरी
चंपा के फूल सी महक़ उठती हैं
इश्क़ की गलियाँ !
और दुआओं सा झरता है प्यार
हमारे जीवन की देहरी पर !!

ऐ सुनो न..
क्या मैं भी इस जनम में
ये दो कोस चल पाउँगा कभी ?

© आनंद

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

बातें की हैं

अपने बिसरे हुए किरदार से बातें की हैं
मुद्दतों बाद किसी यार से बातें की हैं

जिंदगी, देखिये अब किस गली में मुड़ती है
रात भर उसने बड़े प्यार से बातें की हैं

उसने बोला है, कोई ख़्वाब नहीं मारेगी
मैंने खुद वक़्त की तलवार से बातें की हैं

तभी से काट रहा हूँ चिकोटियाँ खुद को
जब से कल अपने तलबगार से बातें की हैं

आज भी घर तेरी ख़ुश्बू को याद करता है
मैंने जब तब दरो दीवार से बातें की हैं

हाय वो शख़्स भी दिल की जुबान रखता है
जिसने हरदम महज़ अधिकार से बातें की हैं

आप आनंद की बातों पे यकीं करना तो
ये न कहना किसी मयख्वार से बातें की हैं

© आनंद