रविवार, 20 मई 2018

जो किया अच्छा किया संसार ने

बेंच डाला घर किराएदार ने
रूह तक कब्ज़ा किया व्यापार ने

छटपटाता वक़्त, बेपरवाह हम
हाल ऐसा कर दिया बाज़ार ने

ज़िंदगी का इम्तहाँ मैं पास था
फेल मुझको कर दिया रफ़्तार ने

दूरियों की आँच यूँ भी कम न थी
आग में घी कर दिया सरकार ने

लज़्ज़त-ए-नाराजगी भी खूब है
जब कभी दिल से मनाया यार ने

अब खुशी में भी कहाँ 'आनंद' है
ठग लिया जबसे भले व्यवहार ने

शुक्र बन्दे का ख़ुदा का शुक्रिया
जो किया अच्छा किया संसार ने

© आनंद

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

अकथ

सुबह उगते हुए सूरज को देखना
देखना ओस की कोई अकेली बूँद
खय्याम की रुबाई से रूबरू होना
या फिर गुनगुनाना मीर की ग़ज़ल
आफिस की मेज़ को बना लेना तबला
और पल भर को  जी लेना बचपन
ऐसा ही कुछ कुछ है तुम्हारा अहसास
जिसे मैं ठीक से कह नहीं पा रहा हूँ 
कभी सुनो मेरे ठहाकों में खुद को
कभी पढ़ो मेरे आँसुओं में अपनी कविता
कि ढूंढो मेरे अंधेरो में अपनी छाया
और लहलहाओ मेरे मौन में बनकर सरगोशियों की फ़सल

युगों से तुम्हें कहने की कोशिश में हूँ
मगर एक भी उपमा नहीं भाती मन को
रह जाते हो तुम हमेशा ही अकथ
जैसे अनकही रह गयी मेरी वेदना
अनलिखी रह गयी मेरी कविता
जैसे अनछुआ रह गया एक फूल
जैसे अनहुआ रह गया मेरा प्रेम
कि जैसे अनजिया बीत गया एक जीवन

सुनो !
कहीं तुम भी
किसी का जीवन तो नहीं ?

© आनंद

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

और कुछ है

हमें ये ग़म नहीं है और कुछ है
वही हमदम नहीं है और कुछ है

चिताएँ देह की ठंढी हुईं पर
जलन मद्धम नहीं है और कुछ है

दुखों की कब्रगाहें कह रही हैं
समय मरहम नहीं है और कुछ है

पखेरू फड़फड़ाकर लौट आया
कफ़स बेदम नहीं है और कुछ है

नफ़रतें बस मोहब्बत की जिदें हैं
मरासिम कम नहीं है और कुछ है

महक़ते गेसुओं की गुनगुनाहट
महज़ सरगम नहीं है और कुछ है

भला आनंद को कैसी विकलता
ये रंज़ोंग़म नहीं है और कुछ है ।

© आनंद

रविवार, 28 जनवरी 2018

मैं क्यों अख़बार होना चाहता हूँ

कभी गुलज़ार होना चाहता हूँ
कभी बेज़ार होना चाहता हूँ

हिमाक़त चाहतों की देखिये तो
मैं खुदमुख़्तार होना चाहता हूँ

न मुझसे इश्क़ की रस्में निभेंगी
मैं इज़्ज़तदार होना चाहता हूँ

ज़माना है बड़ी उपयोगिता का
मगर बेकार होना चाहता हूँ

अगरचे तुम कोई ग़ुल हो चमन का
उसी का ख़ार होना चाहता हूँ

कोई भी नाव हो केवट कोई हो
मैं दरिया पार होना चाहता हूँ

है जीवन एक लंबी सी कहानी
मैं उपसंहार होना चाहता हूँ

मैं किनसे हूँ मुख़ातिब और क्यों हूँ
मैं क्यों अख़बार होना चाहता हूँ

कभी 'आनंद' की गलियों में आओ
मैं बंदनवार होना चाहता हूँ !

© आनंद

रविवार, 24 दिसंबर 2017

दिसंबर के ख़्वाब...

(१)

हमें एक सीढ़ी बनानी थी
छत पर धूप में पड़े ख़्वाबों तक पहुँचने और उन्हें सूर्यास्त से पहले ही उतार लेने के लिए,
अम्मा बाबू जी को खत में लिखा करती थीं ये बात.. कि
दिसम्बर के दिनों अगर ख़्वाबों की देखभाल ठीक हो जाये तो बसंत आने पर खिलते हैं उनमें
मनभावन फूल,
मैं अकेले बाँस तो हो सकता था किंतु सीढ़ी नहीं
हमारे भावों की एक सीढ़ी
घर की छत तक तभी पहुँच पायी
जब तुम्हारा समर्पण लग गया उसमें डंडों की तरह,
किसी का ऊपर चढ़ना या नीचे उतरना
हो सकता है एकांतिक यात्रा
किंतु
सीढियाँ हमेशा प्रतीक हैं साथ की सहचर की !

मेरी सहचरी !
तुम्हें बसंत ऋतु की हार्दिक शुभकामनाएँ !

(२)

दिसंबर के किसी ख़्वाब में घुसती हुई
नवंबर की याद और जनवरी की कल्पना को... अब
डपट देता हूँ मैं
पूस माघ वाले समय में ऐसा नहीं कर पाता मैं
तब उतरते अगहन में फागुन की कल्पना और तैयारी
दोनों सहज स्वीकार्य थीं
अंग्रेजों के आदर्श जीवन ने तो हमारे फागुन से भी फगुनहट छीन ली,
इस दिसंबर मैंने भी कोई ग्लोबल सपना नहीं देखा
न धरती को सुंदर बनाने का
न ही सुख और समृद्धि का
बस खोया रहा तुम्हारी कजरारी आँखों की शर्मीली मुस्कान में
सुना है इस बार फागुन और बसंत ने हाथ मिला लिया है
मार्च की बजट समीक्षाओं के खिलाफ़,

सुनो
इस बार फागुन का हर रंग जी लेना
और जी लेना इस साल की बसंत बहार !

© आनंद